उत्तर प्रदेशबस्तीलखनऊसिद्धार्थनगर 

।। रोडवेज बना ‘सरकारी मधुशाला’: जहाँ पुलिस की सुरक्षा में छलकते हैं जाम।।

।। कानून को लगा 'चखना': रोडवेज पर पुलिस की नाक के नीचे चल रहा 'ओपन बार'।

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। रोडवेज का ‘खुला बार’: जहाँ खाकी की ‘कृपा’ से जाम छलकते हैं।।

02 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। अगर आप शराब के शौकीन हैं और सुकून की तलाश में हैं, तो महंगे होटलों या पब में जाकर पैसे बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। बस्ती का रोडवेज परिसर आपके लिए ‘ओपन एयर बार’ की सुविधा प्रदान कर रहा है। यहाँ न केवल जाम टकराने की आजादी है, बल्कि सुरक्षा का जिम्मा भी कथित तौर पर उन कंधों पर है, जिन्हें ‘एंटी-चीयर्स’ अभियान सफल बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी।

👉 खाकी का साया और जाम का माया:—

रोडवेज पर शाम ढलते ही नजारा किसी जश्न जैसा होता है। बस की सीटों से लेकर फुटपाथ तक, हर जगह ‘मैखाने’ सज जाते हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि पुलिस की गश्त वाली गाड़ियां यहाँ से गुजरती तो हैं, लेकिन शायद उनकी खिड़कियों के शीशे इतने काले हैं कि बाहर छलकते जाम उन्हें दिखाई नहीं देते। या फिर शायद पुलिस ‘अतिथि देवो भव:’ की परंपरा को निभाते हुए पियक्कड़ों को टोकना अपनी शान के खिलाफ समझती है।

👉 एंटी-चीयर्स या ‘एंटी-पब्लिक’ अभियान?

शहर के बाकी कोनों में दो-चार लोगों को पकड़कर फोटो खिंचवाना और ‘एंटी-चीयर्स’ की हेडलाइन बनवाना तो आसान है, लेकिन रोडवेज जैसे व्यस्त ठिकाने पर पहुँचते ही पुलिस की ‘ईगल आई’ (चील जैसी नजर) को शायद मोतियाबिंद हो जाता है। यात्री परेशान हैं, महिलाएं बगलें झांकते हुए तेज कदमों से निकल रही हैं, लेकिन हमारे वर्दीधारी मित्र शायद इस इंतजार में हैं कि कोई शराबी खुद आकर उन्हें ‘चीयर्स’ कहे, तभी कार्रवाई होगी।

👉 सुविधाएं और सुरक्षा:—

लोग कहते हैं कि पुलिस की मिलीभगत के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, यहाँ तो पूरी बोतलें खाली हो रही हैं। ऐसा लगता है कि रोडवेज परिसर को ‘स्पेशल ड्रिंकिंग जोन’ घोषित कर दिया गया है, जहाँ कानून की किताब के पन्ने शायद चखने के पैकेट के नीचे दबे पड़े हैं।

👉 निष्कर्ष:—

अगर यही हाल रहा तो जल्द ही रोडवेज के साइन बोर्ड पर लिखा होगा— “सफर का आनंद लें, और बस न मिले तो यहीं बैठकर दो पेग मार लें, पुलिस रक्षा के लिए तैनात है।” प्रशासन को चाहिए कि वह फोटो खिंचवाने वाले अभियानों से बाहर निकले और रोडवेज की इस ‘मधुशाला’ पर लगाम कसे, वरना जनता समझ जाएगी कि ‘एंटी-चीयर्स’ सिर्फ एक सरकारी ड्रामा है।

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